Thursday, 30 August 2012

itihaas pqrt 2


इतिहास काल भी दो भागों में बाँटा जा सकता है| 

-राजनीतिक इतिहास -धार्मिक इतिहास|यद्यपि धर्म राजनीति से कभी अलग नहीं रहा,फिर भी राजनीति को भी हम दो भागों में बाँट सकते हैं| 
-धर्मांध राजनीति-धर्मनिरपेक्ष राजनीति|परंतु धर्मनिरपेक्ष राजनीति का अर्थ धरमहीनता नहीं है,इसलिए धर्मनिपेक्ष राजनीति का अर्थ हमें बहुत ही सावधानी तथा विद्वता से करना होगा| 
आइए हम विभिन्न धर्मों के उदगम का वर्णन संक्षेप में करें|कोई विवाद नहीं है हज़रत ईसा के धर्म का आवीरभाव लगभग २००० वर्ष पूर्व और हज़रत मोहम्मद के इस्लाम धर्म का लगभग १५०० वर्ष पूर्व हुआ|तो क्या ईसा से पहले संसार धर्मविहीन था|निश्चय ही नहीं|अनेक तर्क विलुप्त हुई सभ्यताओं के अवशेष,भाषा की सामीयता,मिलतेउर जुलते रीति रिवाज और मान्यताएँ आज भी साक्षी हैं की एक समय था जब पूरे विश्व में आर्य जीवन पद्यति प्रचिलित|भारतीय नाविक इंग्लेंड और अमरीका तक पहुँचे थे|अंतर केवल इतना था की भारतीय जहाँ भी गये उन्होंने अपने संस्कार और सभ्यता दी और वहीं के जान जीवन में एक रस हो गये|मध्य पूर्व एशिया और योरोप तक में आज भी हिदू नाम,हिंदू सभ्यता,पौराणिक गाथाएँ जैसी की तैसी विद्यमान हैं|इंडोनेशिया,बाली इत्यादि देशों में तो आज भी राम लीला का मंचन यथावत होता है|बोध, सिख जैन,आरीय सामाजी,सनातनी,वैष्णव,शेविय और अनाकानेक मत हिंदू दर्शन की ही अभाव्यक्ति करते हैं|इटली के इतिहास को आप गौर से देखें तो हिंदू धर्म के दर्शन कर सकते हैं|यहाँ तक की पोप शब्द भी संस्कृत पाप-(पापों को हरने वाला)शब्द का अपभ्रंश है|जब ईसाई मत का उदय समस्त योरोप में विभिन्न कारणों से उसे अपनाया जाने लगा|जब यपरोप वासी अन्य भागों में अपना राज्य स्थापित करने लगे,उनके द्वारा ईसाई मत दुनिया के अन्य भागो में फैलने लगा,यद्यपि ईसाई धर्म का विस्तारकहीं लालच देकर(अँग्रेज़ों की भारतीय सेना के सिपाहियों को ईसाई धर्म स्वीकार करने पर एक रेंक की पदोन्नति दी जाती थी)कहीं कुटिलता से ,कहीं भेद भाव का लाभ उठा कर तथा कहीं अन्य तरीकों से किया गया,परंतु बलात धर्म परिवर्तन का कोई प्रमाण नहीं है| 
यहाँ यह कहना अप्रसांगिक ना होगा,जब सोलवी शताब्दी में ईसाई मिशनरी केरल पहुँचे,उन्हों ने वहाँ के भोले भाले निवासियों को एक चमत्कार डिक्चायायैया|तीन मूर्तियाँएक जैसे भार और एक जैसे आकर की लीं|बताया गया इन में एक ईसा एक मोहम्मद और एक राम की है,तीनों मूर्तियाँ पानी में डाल दी गयीं,मोहम्मद और राम तो डूब गये और ईसा तैरते रहे|इस प्रकार ईसा की महत्ता को दर्शाया गया|उस समय गोवा दामन और दीव में ईसाई धर्मावलंबियों का शासन था|परंतु इस्लाम धर्म का विस्तार तो मशाल और तलवार की धार से किया गया|जहाँ जहाँ मुस्लिम आक्रमणकारी जाते थे वहाँ ना केवल लूटमार करते थे बल्कि वहाँ की सभ्यता ,वहाँ के पूजा स्थलों को तोड़ कर या थोड़ी फेरबदल करके मस्जिदों में बदल दिया करते थे तथा अपने अत्याचारों से धर्मांतरण को विवश कर दिया करते थे|यहाँ तक की आज भी सऊदी अरब में और अब सत्ता परिवर्तन के बाद अफ़ग़ानिस्तान में भी हिंदुओं को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया जेया रहा है|अन्यथा उन्हें देश छोड़ने पर विवश होना पद रहा है|भारत में जीतने भी मुस्लिम आक्रमण हुए और बाद में मुस्लिम साम्राज्य के प्रत्येक सुल्तान ने भी अपने अपने ढंग से हिंदू मंदिरों और हिंदू इमारतों में फेरबदल करके अपने महल और मक़बरे बनवाए|हिंदू मंदिरों को तोड़ कर उसी के मलबे से मस्जिदें बनवाईं|और मंदिरों को अपवित्र किया|मुगल बादशाहों का एक मत उद्देश् अपने साम्राज्य और हरमका विस्तार रहा|अकबर द्वारा हिंदू कन्न्याओं से किए गये विवाह सर्वधर्म संभव की भावना से नहीं,राजपूतों की परंपरागत शनोशौक़त को ठेस पहुँचानेके उद्देश्य से पूर्णतयाअपहरण कांड थे |अकबर ने जोधा बाई के टीन भाईयों,राजकुमार खांगर,राज सिंह और जगन्नाथ का अपहरण करके उसके पिता जयपुर के महाराज राजा भार्मल से जोधाबाई को फ़िरोती के रूप में प्राप्त किया था| 
राजपूत योद्धा थे,लदे भी बहुत वीरता से परंतु संकीर्ण विचारधारा और अपने अहम् के कारण,एक दूसरे से तालमेल ना रखने के कारण एक एक करके प्रास्त होते गये यहाँ तक की मुस्लिम शासक भी जो मुगल साम्राज्य से पहले गुजरात से दक्षिण और बंगाल तक छोटी बड़ी रिआस्तोन के मालिक बन बैठे थे एक एक करके मुगल साम्राज्य के आधीन होते गये|अकबर महा धूर्त महा व्यभचारी महा दुष्ट और महा आततायी था,ऐसे व्यक्ति को महान कहना क्या उन लाखों राजपूतानियों के प्रति अन्याय नहीं होगा जिन्हों ने अकबर और उसके दरिंदे सिपाहीओं से अपने सतीत्व की रक्षा हेतु जोहर किए|अकबर की धूर्त्ताओं और विलास्ताओन पर एक पूरी पुस्तक श्री पी एन ओक द्वारा लिखित सप्रमाण उपलब्ध है|दम घोटने वाले इतिहास के इस प्रदूषण को दूर कने के लिए गहन शोधकरना होगा और इतिहास का सच सामनेलाना होगा तथा स्वतंत्र लोक तांत्रिक भारत के प्रत्येक नागरिकको उसे स्वीकार करना होगा| 

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