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(क) लड़की के लिए पिता की संपत्ति में हिस्सा दिया गया(परंतु क़ानून बन जाने पर भी कितनी बहने अपने भाइयों से हिस्सा मांगतीन हैं) फिर भी यह एक कुरीति मान कर स्वीकार कर लिया गया|इसके विपरीत मुसलमानों ने शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के उपरांत भी केंद्र सरकार पर दबाव डाल कर संविधान में संशोधन करवाकर शाहबानो को उसके अधिकार से वंचित कर दिया|
(ख)तलाक़ का अधिकार दिया गया|यद्यपि सांस्कृतिक प्रदूषण,सांस्कृतिक मूल्यों के ह्रास के कारण कुछ हिंदू महिलाएँ इस अधिकार का प्रियोग करती हैं,परंतु आज भी अन्य धर्मों और अन्य देशों के मुक़ाबले उनका प्रतिशत क्या है|आज भी एक हिंदू दंपति का पारस्परिक संबंध एक विलक्षणता है|
(ग)हिंदू धार्मिक स्थानों मंदिरों की व्यवस्था की दृष्टि से अधिगेहन किया गया,उसे भी हिंदुओं ने सहन किया|याद रहे इस प्रकार मस्जिद या किसी मुस्लिम संस्थान का अधिग्रहण सरकार के लिए संभव नहीं है|
(घ)बहू विवाह पर प्रतिबंध लगाया गया,ऐसा कोई प्रतिबंध दूसरे धर्मों पर लागू नहीं होता|
यह कुछ उधारण हिंदुओं की जीवन पद्यति में हमारी धर्मनिरपेक्ष सरकार के क़ानूनी हस्तक्षेप के हैं|इस संबंध में एक प्रश्न उठता है|
(क)की हिंदू कोड यदि हदुओं के धार्मिक मामले में हस्तक्षेप है तो यह साहस कयन किया गया|
(ख) अगर यह उनके लाभ के लिया है तो यह लाभ अन्य धर्मावलंबियों के लिए क्यों नहीं दिया गया,यह हिंदू कोड की जगह राष्ट्रिए कोड क्यों नहीं बनाया गया|
(ग) सिविल कोड सब नागरिकों के लिए एक क्यों नहीं है,क्या भारतीय दंड सहीनता(आई. पी. सी.)और अपराधी प्रक्रिया सहीनता(सीआर.पी.सी.)भी विभिन्न धर्मों के लिए भिन्न भिन्न होंगी|
१-क्या हिंदुओं के लिए चोरी करने पर कुछ महीने का कारावास,और मुसलमानों के हाथ काट दिए जाएँगे|
२-बलात्कारी हिंदू के लिए सात वर्ष कारावास,और मुसलमान को पत्थर मार मारमकार मार दिया जाएगा|
३- हिंदुओं(काफिरों)के विरुद्ध उकसाने वाली क़ुरान की आयतों पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक याचिका पर कलकत्ता हाई कोर्ट ने यह कहकर अस्वीकार कर दिया की यह इस्लाम की आस्था का मामला है|इस तारह क़ुरान के अनुसार काफ़िर के जान माल को नष्ट कर देना सवाब है,तो क्या इस सवाब को लूट लेने की अनुमति देदी जाएगी|
४-क्या अदालत की अवमानना का माप दंड भिन्न धर्मावलंबियों के लिए भिन्न भिन्न है|
५-क्या कोचीन उच्च न्यायालय के गिरफ्तारी वारंट इमाम अब्दुल्ला बुखारी पर लागू नहीं होते|
६-शाहबानो जैसे मामले में उच्चताम न्यायालय के अंतिम आदेश के बाद संविधान संशोधन क्या तुष्टिकरण नहीं है,क्या न्यायालय के आदेश से पूर्व ही,यदि बहुत आवश्यक था,संविधान संशोधन नहीं किया जा सकता था,क्या इसकी पुनर्वरत्ती बार बार होती रहेगी|क्या राम जन्म भूमि विवाद पर भी न्यायालय की अस्मिता दाव पर लगाई जाएगी
७- सेटनिक वारसिस पर प्रतिबंध लगाया गया,जिसका लेखक एक विदेशी और मुसलमान ही था,प्रकाशन भी विदेश(इंग्लेंड) मे हुआ था और उस देश के क़ानून के अनुसार यह कोई अपराध भी नहीं था,भारत को उस से क्या लेना देना था फिर भारत में उस पुस्तक पर प्रतिबंध क्यों लगा दिया गया|क्या इस धर्मनिरपेक्ष सरकार को जुलाई १९५७ में सरिता नाम की एक पत्रिका में छपी एक कविता "राम का अंतर्द्वंद" की याद है,जिस से भारत का हिदू जनमानस्थइल्मिला उठा था,धर्मनिरपेक्ष सरकार ने उस पत्रिका पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया,क्यों उसकी प्रतियाँ ज़ब्त नहीं की गयीं,न्यायालय के रहमो करम पर करोड़ों हदुओं की भावनाओं को छोड़ दिया गया
और न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर पत्रिका के पक्ष में निर्णय दे दिया|करोड़ों हिदू न्यायालय का मान रखते हुए दिल मसोस कर रह गये|क्या राम जन्म भूमि मुक्ति यग्य में भी न्यायालय का जल डाल कर यगयाग्ञी को शांत कर देना चाहती है,क्या न्यायालय का निर्णय आने के पश्चात ही सरकार को विशय की गंभीरता का आभास होगा|क्या रक्तपात के पश्चात ही संविधान में संशोधन किया जाएगा|क्यों ऐसे विवादों में न्यायालय को घसीटा जाता है,जिनका निर्णय करना न्यायक प्रक्रिया द्वारा संभव ही नहीं है|क्यों ऐसे विषयों में न्यायालय की अस्मिता दाव पर लादी जाती है|
८- धार्मिक स्थलों के लिए क़ानून बनाया गया,कश्मीर को इस क़ानून से मुक्त रखा गया,क्या कश्मीर को इस क़ानून सेमुक्त ना रखने पर धर्मनिरपेक्षता आहत हो जाती|राम जन्म भूमि विवाद को भी इस क़ानून से अलग रखा गया है तो कृष्ण जन्म भूमि और काशी विश्वनाथ मंदिर को भी सम्मिलित करके तीनो का निपटारा एक साथ ही करने पर विचार क्यों नहीं किया गया| हिंदुओं ने सदा राष्ट्र के ऊत्तान के लिए तत्परता दिखाई है,मैं यह नहीं कहता की केवल हिंदू ही राष्ट्रवादी हैं,अपेक्षा तो यही की जाती है की राष्ट्र का प्रत्येक घातक राष्ट्रवादी हो,मीर जाफ़र अगर हैंटो जयचंद भी हर जगह हैं|बलात्कारी हत्त्यरे, तस्कर दंगाई का कोई धर्म नहीं होता,कोई राष्ट्रीयता नहीं होती,परंतु देश के जो सामान्य नागरिक हैं उन्हें राष्ट्र की परिभाषा तो जननी ही होगी|राष्ट्र के प्रति समर्पित तो होना ही होगा|
धर्म ग्रंथ हमारे मार्ग दर्शक हैं,उनमें आध्यात्म,व्यापार,कृषि,आयुर्विज्ञान, तथा शासन विधि इत्यादि सभी कुछ है|फिर भी हमारा एक संविधान है|प्रशासनिक,"ला एंड ऑर्डर" की दृष्टि से विभिन्न क़ानून बने हैं,आवश्यकतानुसार उन में संशोधन भी किया गया है,फिर भी धर्म ग्रंथों से कोई टकराव नहीं है|क्या हिंदू धर्म ग्रंथों में,दंड व्यवस्था,सामाजिक व्यवस्था का मार्ग दर्शन नहीं है,फिर भी हम हिंदू किसी हिंदू पर्सनल ला के पूर्वाग्रही नहीं हैं|
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