Wednesday, 29 August 2012

itihaas part 3


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जैसा मैने पहले कहा,हमें एतिहासिक काल के इतिहास पर शोध की आवश्यकता है,इतिहास पूर्व काल तो हमें निर्विवाद स्वीकार करना ही होगा क्योंकि उसके आधार की तो केवल धर्म पुस्तकें,विश्वास तथा मानयताएँ ही साक्षी हैं|गुलामी काल का लिखित इतिहास कितना सच्चा कितना झूता होगा इसका अनुमान बड़ी सरलता से स्वतंत्रता उपरांत के इतिहास से लगाया जेया सकता है जिन घटनाओं के प्रत्यक्ष दर्शी आज भी जीवित हैं,उन घटनाओं को भी कितना तोड़ मरोड़ कर लिखा गया है|हमारा दुर्भाग्य यह है की स्वतंत्रता पूर्व के इतिहास को शोधित करना तो दूर स्वतंत्रता उपरांत इतिहास में भी भ्रांतियाँ उत्पन्न कर दी गयी हैं| 
क्या इसका भी कोई प्रमाण देना होगा की भारत का विभाजन मुस्लिम सांप्रादयकता के सामने घुटने टेक कर धर्म के आधार पर हुआ|भारत के विभाजन का कोई औचित्य नहीं था,स्वयं महात्मा गाँधी ने कहा था"भारत का विभाजन मेरी लाश पर होगा",फिर भी भारत का विभाजन हुआ|क्योंकि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए हमारा धीरज समाप्त हो चुका था और इसी कारण विभाजन के मूल्य पर स्वतंत्रता प्राप्त कर ली गयी|जब श्री जिन्नाह विभाजन पर ज़ोर दे रहे थे देश संप्रादयक आग में जल रहा था,ना चाहते हुए डाक्टर अंबेडकर को भी कहना पड़ा,हिंदू जनता सुख से रह सके इस लिए आवश्यक है पाकिस्तान बना दिया जाए|उनका कहना था की सारे मुसलमान उधर चले जाएँ,और सारे हिंदू इधर जाएँ क्योंकि इस्लाम की कट्टरता के कारण उसमें सुधार संभव नहीं है,यहाँ तक की डाक्टर अंबेडकर ने सेना में मुसलमानों की संख्या घटाने का भी प्रस्ताव रखा था|डाक्टर अंबेडकर की लिखी पुस्तक,पाकिस्तान एंड पार्टीशन ऑफ इंडिया,में मुसलमानों द्वारा हिंदुओं पर किए गये अत्त्यचारोन और मंदिरों के तोड़े जाने का भी वर्णन है|उन्होने संकीर्ण विचारों वाले हिंदू सवर्णों से विरोध प्रकट करने के लिए बोद्ध मत में दीक्षा ली थी जो हिंदू धर्म का ही एक अंग है,उन्होंने कभी हिंदू धर्म का त्याग नहीं किया,यद्यपि उन्हें मुसलमान और ईसाई बनाने के लिए उन धर्मों के धर्मगुरुओं ने बहुत प्रयास किया| 
हर पग पर इतिहास हमें सोचने पर विवश करता है,आज राजनीतीबाज़ हिंदुओं के ही विभाजन की चेष्टा कर रहे हैं,तथाकथित सवर्ण और पिछड़ी जातियों में भेद भाव उत्पन्न किया जा रहा है|आज जब भेद भाव स्वतः मिटता जा रहा है|हिंदू धर्म के नाम पर की गयी भूलों से सबक़ ले रहा है|वोटों की राजनीति "हरिजन"के नाम पर अलगाओ उत्पन्न कर हिंदुओं को विभाजित करने का प्रयास कर रही है|दुर्भाग्य से हिंदुओं में जाती प्रथा की बुराई सदा रही रही है और आज भी है परंतु हिंदू धर्म का विभाजन कभी नहीं हुआ|जैन बोद्ध,आर्य सामाज़ी,सिख इत्यादि में रोटी बेटी का रिश्ता आज भी क़ायम है\हिंदू समाज का ऐसा कौन सा अंग है जो मह्रिशि वल्मीक,गुरु नानक देव जी,भगवान महावीर, भगवान बुद्ध,भगवान राम,कृष्ण,स्वामी दया नंद स्वामी विवेका नंदौर आदि गुरु शंकराचार्य को अपना ईष्ट नहीं मानता|समाचार पत्रों की भाषा भी भेद भाव पूर्ण हो गयी है,समाचार आता है,"हरिजन लड़की से बलात्कार"|क्या बलात्कार अनन्य जाती की अथवा अनन्य धर्मों की महिलाओं से नहीं होता,क्या बलात्कारी जाती पूछ कर बलात्कार करता है,क्या बलात्कारी भी कोई जाती अथवा धर्म होता है| 
मुस्लिम सांप्रदायकता से दुखी होते हुए भी हमारे संविधान निर्माता डाक्टरअंबेडकर ने भारत को संविधान में धर्मनिरपेक्ष तथा लोकतंत्र रखा|यद्यपि भारत ना केवल अँग्रेज़ों की २०० वर्ष की गुलामी से अपितु उस से पूर्व मुसलमानों की एक हज़ार वर्ष की गुलामी से भी स्वतंत्र हुआ था और विशेष कर देश के धार्मिक आधार पर विभाजन के उपरांत तो भारत को १२०० वर्ष पूर्व का स्वरूप प्रदान करना चाहिए था|फिर भी हमारी संविधान सभा जिसमें हिंदुओं का प्रचंड बहुमत था ने स्वतंत्र भारत के संविधान को जो भी रूप दिया हम स्वीकार करते हैं|और उसका आदर करते हैं,फिर भी हम यह उल्लेख करना चाहेंगे की किसी भी देश का संविधान कोई धर्म पुस्तक नहीं है,आवश्यकता अनुसार इसमें संशोधन का प्रावधान है,परंतु संशोधन का अर्थ यह नहीं है की उसे मुर्गे की टाँग की तारह मरोड़ दिया जाए|हमारा दुर्भाग्य है की संविधान में आज तक जो भी संशोधन हुए हैं अधिकांश दलीय राजनीति से प्रेरित अथवा छद्म धर्मनिरपेक्षता तथा तथाकथित अल्प संख्यकों के तुषीकर्ण हेतु हुए हैं| 
धर्मनिरपेक्ष शासन का अर्थ की बिना किसी धार्मिक भेद भाव के व्यवस्था चलाना परंतु विडंबना है की शासन का हर पग धार्मिक पक्षपात से ही उठता है|धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है किसी भी धर्म के अनुयायी को उसकी आस्था के अनुरूप पूजा अर्चना इबादत का अधिकार,धर्मनिरपेक्षता का अर्थ ना तो धर्म हीनता है ना ही धर्म के नाम पर भेद भाव|यदि बहुसंख्यकों को कोई विशेष दर्जा पाने का अधिकार नहीं है तो धार्मिक अल्पसंख्यकों को भी कोई विशेष रियायत पाने का अधोकार नहीं है|समान अवसर दिया जाना चाहिए,दिया गया है|कोई भी क़ानून समस्त देशवासीओं पर लागू होता है विभिन्न धर्मों का अपना अपना नहीं|किसी का पर्सनल ला देश के संविधान से और क़ानून से बड़ा नहीं होता|यदि किसी धर्म पुस्तक और देश के क़ानून में कोई विरोधाभास है तो इस स्थिति में देश का क़ानून ही सर्वोपरि होगा| 
मैं यहाँ कोई धार्मिक बहस छेड़ने नहीं जेया रहा हूँ,केवल कुछ उधारण देकर यह बताना चाहता हूँ की "कॉम" (राष्ट्र) और देशवासीओं के हित में हिदू धर्मावलंबियों ने सदा अपनी धार्मिक मान्यताओं को कुछ कट्टर पंथियों के विरोध के बावजूद भी बदला जाने दिया है| 
-सती:-सती प्रथा एक धार्मिक मान्यता थी और उसके पीछे भी एक दार्शनिक कारण था,परंतु उस में विकृतियाँ जाने के कारण स्वयं एक हिंदू,राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा उन्मूलन के लिए आंदोलन चलाया उन्हें अंतर्विधों का सामना भी करना पड़ा परंतु अंत में हिंदू बहुमत को उनका साथ देना पड़ा यद्यपि अँग्रेज़ शासक धार्मिक मामलों में दखल नहीं देते थे परंतु उन्हें जनमत के सामने रोक लगानी पड़ी|स्वतंत्र भारत में भी इक्का दुक्का ऐसी घटनाएँ हुईं तो भारत सरकार ने ना केवल उसे रोका तथापि सती के महिमा मंदन पर भी रोक लगा दी|यद्यपि यह हिंदुओं के धार्मिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप था| 
:-विधवा विवाह:-यद्यपि हिंदू जीवन पद्यति,हिंदू जीवन दर्शन एक संपूर्ण व्यवस्था है फिर भी विभिन्न काल चाक्रों में विकृतियाँ हुई हैं|विधवा विवाह विशेष परिस्तिथि वश वर्जित था,विधवा स्वप्न में भी पुनर्विवाह की कल्पना नहीं कर सकती थी और इसे भाग्य का लेखा समझ कर संतोष भी कर लेती थी,परंतु ईश्वर चंद विद्यासागर,एक हिंदू ने ही इसका विरोध किया,उन्हें यह अमानवीय लगा और अंततः समाज को विधवा विवाह की अनुमति देनी पड़ी| 

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