Wednesday, 29 August 2012

after dec. 6 1992

रहने दो ज्वालमुक्खी शांत
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अपराध बोध कैसा और क्यों,नहीं चिंतित हैं श्री आडवाणी,आख़िर ये इक दिन होना था हो चुकी थी ऐसी नाभवानी.

विनती अवहेलिट हुई प्रयास समझौते के सब विफल हुए,कैलाशपति के तांडव की मुद्रा भी गयी ना पहचानी.

भगवान कृष्ण के पाच्च्जन्य का शंख नाद भी सुना नहीं,दुर्योधन की हाथ धर्मी सी नर्सीघ कर बैठे नादानी.


हम आए थे निर्माण हेतु
विध्वंस नहीं था लक्ष्य कभी,जब बाँध धैर्य का टूट गया रोके ना रुके शिव साइनानी.

मिल जाता निर्णयी उचित समय क्यों अश्रु बहती भारत मा,सब कार्य शांति से हो जाता क्यों होती जान धन की हानि.

हो गया प्रशस्त है मार्ग पुन्हं बैठो वार्ता के आसान पर,इक कहे दूसरे ने मानी नानक आखे दोनों ज्ञानी.

ताज कर यूपी का सिंघासन हो गये धान्या कल्याण सिंघ,मानवता की रक्षा की थी नहीं न्यायालय की अवमानी.

प्रतिबंध लगे थे पहले भी क्या भूल गये इतनी जल्दी,इंद्रासन ढोल उठा था तब ,है कथा वही फिर दोहरानी.

जहाँ बसत हमारे रामलला मस्जिद कैसे बन सकट वहाँ,निर्माण भव्या मंदिर होगा सुन लो ज्ञानी और अज्ञानी.

यह आन बान का प्रश्न नहीं गहरी हैं जड़ें आस्था की,यह अरब नहीं यह भारत है यहाँ बच्चा बच्चाबलिदानी .

यह दामन चक्र तो क्रीड़ा है,सदियों खेले हैं हम इस से,बहता है रक्त शिराओं मैं बह रहा नहीं इन मैं पानी.

"निरपेक्ष धर्म" की व्याख्या को समझो भाषाविद नरसिम्हा,वो शासन नहीं कुशासन है जो धर्मविहीनऔरअज्ञानी.

आवाज़ समय की पहचानो कुच्छ होश करो नर्सिंघ राव,रहने दो ज्वालामुखी शांत सरयू में बहने दो पानी.

विनोद कुमार मित्त

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