Wednesday, 29 August 2012

itihaas part 5


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धर्म ग्रंथों के उपदेश पूजा अर्चना,आध्यात्मिक दर्शन में,भले ही कोई बदलाव ना हो,परंतु हज़ारों वर्ष पूर्व दिए गये व्यवस्था संबंधी आदेशों को जैसा का तैसा कैसे रखा जेया सकता है|धार्मिक आदर्श अलग हो सकते हैं,पैगंबर,अवतार,पूजा पद्यति धर्म अनुसार अलग हो सकती है,स्वधर्म अनुसार उस पर चलने का हमारा अधिकार भी है,परंतु राष्ट्र की परिभाषा को सही रूप में जानना नितांत आवश्यक है|जैसा मैने पहले भी कहा ईसा और मोहम्मद से अपितु यह कहा जाए की आदि काल से आर्य(हिंदू)धर्म विद्यमान था,इतिहास काल के और इतिहास पूर्व काल के प्रमाण यह सिद्ध करते हैं,की भारत और समस्त मध्य पूर्व एशिया एक हिंदू राष्ट्र था तथा आज भी राष्ट्र की सही परिभाषा के अंतर्गत भारत एक हिंदू राष्ट्र है जिसकी अपनी एक परंपरा,दर्शन और आदर्श है| 
आज का भारत विभिन्न धर्मों का एक संगम अवश्य हाइपरंतु इस का यह तात्पर्य नहीं की भारत एक खिचड़ी संस्कृति का देश है|भारत की अपनी एक विशेष संस्कृति है|भगवान राम,भगवान कृष्ण हमारा लिए भगवान के अवतार हैं|हम भारत के अहिंदुओं से यह अपेक्षा नहीं करते की वो उन्हें अवतार मानेपरंतु निसंदेह भगवान राम और कृष्ण को भारत की आस्था का केंद्र होने के कारण विशिष्ठ सम्मान तो प्रत्येक व्यक्ति को चाहे वो हिंदू हो या मुसलमानिकता,ईसाई हो या पारसी देना ही होगा|जहाँ अल्पसंख्यकों के सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा करना बहुसंख्यकों का दायत्व है वहीं बहुसंख्यकों की आस्था और भारत की प्राचीन सांस्कृतिक धारोवर का सम्मान करना अल्पसंख्यकों का भी कर्तव्य है| 
मैं भारत के अल्पसंख्यक वर्ग को विनम्रता से एक वास्तविकता से परिचित कराना चटा हूँ| 
-भारत में अल्पसंख्यकों का भविष्य छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों के हाथों में सुरक्षित नहीं है| 
-राजनीतीबाज़ों की धर्मनिरपेक्षता के नाम पर,अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की नीति अस्थाई रूप से भले ही अल्पसंख्यकों को अपने हित में लगे परंतु दीर्घ काल में यह विनाशकारी सिद्ध होगी| 
-इसी प्रकार जातिगत सिद्धांत पर आरक्षण की नीति भी विनाशकारी है|पिछड़ा वर्ग कब तक आरक्षण की बैसाखी के सहारे चलता रहेगा|४५ वर्ष में भी क्यों पिछड़ा वर्ग साथ नहीं आसका,यद्यपि डाक्टर अंबेडकर ने आरक्षण के लिए केवल दस वर्ष रखे थे|इतने लंबे समय के पश्चात भी,दलित,दलित ही रहे,यह सब वोट की और तुष्टिकरण की राजनीति का परिणाम है|मुफ़्त में मिला कोई धन मनुष्य के विकास में काम नहीं सकता|बैसाखी को फेंक दलित वर्ग को अपने पैरों पर खड़ा होना होगा|हिदू समाज का छुआछूत का कलंक धर्म का नहीं,जाती व्यवस्था का दुष्परिणाम है|स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत सामाजिक और क़ानूनी दोनो स्तरों पर इस कलंक को ढोने की प्रक्रिया आरंभ हुई हईयोर निश्छी ही इस में उल्लेखनीय कमी आई है|सवर्ण कहे जाने वाले हिंदुओं को दोष देने के साथ साथ क्या मेरे हरिजन भाई एक प्रश्न पर विचार करेंगे|आज स्वतंत्रता के ४५ वर्ष बाद भी ,सामाजिक और क़ानूनी रूप से भी मंदिर प्रवेश का अधिकार प्राप्त होने (अपवाद को छोड़ कर),आसपर्षता अपराध घोषित हो जाने पर भीकया हरिजन कहे जाने वाले अनुसूचित जातियों के तथा अन्य दलित वर्ग के लोग एक रस हो पाए हैं|क्या पहले "भंगी"और "चमार"कहे जाने वाले जाती वर्ग में रोटी बेटी का रिश्ता स्थापित हो पाया है|क्या उनके बीच छुआछूत पूरी तारह समाप्त हो गया है|हमें यह भेद भाव डोर करना ही होगा तभी हम एक नये समाज ,एक नये इतिहास की संरचना कर सकेंगे| 
अलाहाबाद उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ,जिन्होने श्रीमती इंदिरा गाँधी के विरुद्ध चुनाओ याचिका में एटिहासिक निर्णय दिया था,जब वो बरेली के ज़िला जज थे,एक जूनियर वकील,जो योग्य तो बहुत थे परंतु अपनर सीनियर से ही चिपके रहते थे,से कहा था"आप बहुत योग्य हैं परंतु जब तक आप अपने सीनियर से चिपके रहेंगे तरक्की नहीं कर पाएँगे,बड़े व्रक्ष की छाया में छोटा व्रक्ष कभी नहीं पनपता"| 
अतः आरक्षण उँचा उठने का एक मात्र मार्ग नहीं है,और अधिक आरक्षण के लिए आंदोलन तो डोर जो पहले से ही आरक्षण का कोटा है उसके लिए भी उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिल पाए हैं|पिछड़ों का उत्थान आरक्षण से नहीं शिक्षा से होगा|मंडल कमीशन की सिफरशों पर ज़ोर देने के स्थान पर,शिक्षा कमीशन बनाए जाने पर ज़ोर दिया जाना चाहिए|और नक़ली मसीहाओं से सावधान रहना चाहिए|सरकार को चाहिए सब्सिडी,अनुदांकी जगह पिछड़ों को विशेष शिक्षा दान की योजना बनाए ताकि एक पीढ़ी के बड़े होने तक पिछड़ा वर्ग समान स्तर पर जाए| 
इतिहास साक्षी है जब आततायी मुस्लिम शासक बाल पूर्वक हिंदुओं का धर्मांतरण करवा रहे थे,शूद्र कहे जाने वाले हिंदू अपने धर्म पर अडिग रहे,अधिकांश धर्म परिवर्तन राजपूतों तथा अन्य सवर्ण जातियों ने ही किया|आज भी राजस्थान में लाखों ऐसे मुसलमान हैं जिन के घर में प्रवेश करके आपको लगेगा की आप किसी राजपूत परिवार में आए हैं|और आज अपने को दलितों का मसीहा बताने वाले लोग उन्हें उन उस धर्म से विलग कर देना चाहते हैं जो उन्होने गुलामी के दिनों में भी नहीं छोड़ा|शूद्र कहे जाने वाले जिन हिंदू भाईयों ने बाद में ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था क्या उनका स्तर आज के पिछड़े हिंदुओं से बेहतर है|वास्तविक समास्सया आर्थिक है|डाक्टर अंबेडकर ने कभी हिंदू धर्म नहीं छोड़ा,केवक बोद्ध मत में दीक्षा ली जो हिंदू धर्म का ही एक अंग है| 
एक बार फिर इतिहास की चर्चा|इतिहास के छात्रों को विशेषकर मुस्लिम विश्वविद्यालय अलीगढ़ के छात्रों को चाहिए की वो स्वयं मुगल कालीन इतिहास का गहराई और ईमानदारी से शॉड करके स्वयं इतिहास की कालिख को धो डालें,यदि इतिहास की सचाई स्वीकार कर ली जाए तो हिंदू मुस्लिम वेममनस्य सदा के लिए समाप्त हो सकता है|

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