Wednesday, 29 August 2012

itihaas pati 1

itihaas part 1


vinod kumar mittal <quill@tachyon.in> Wed, Aug 22, 2012 at 2:21 PM
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इतिहास की भ्रांतियाँ 
छद्म धर्मनिरपेक्षता और तुष्टिकरण,आख़िर कब तक?  
हम कितने वर्ष गुलाम रहे,इतिहास को इसका उत्तर देना चाहिए|परंतु जो इतिहास हमें पढ़ाया जाता है,क्या वो इसका उत्तर देता है|सिकंदर और अकबर को महान बताने ,बहादुर शाह को अँग्रेज़ों के विरुध स्वतंत्रता संग्राम का नायक बताने वाला इतिहास,पुरानी दिल्ली का शाह जहाँ और फतेहपुर सीकरी का अकबर को निर्माता बताने वाला इतिहास,(शाहजहाँ के गद्दी पर बैठने से २३० वर्ष पूर्व १३९८ ईस्वी में शाहजहाँ के पित्र पक्ष की दसवीं पीढ़ी का तेमूरलंग स्वीकार करता है की जामा मस्जिद एक हिंदू मंदिर था और पुरानी दिल्ली पूरी तारह बसी हुई थी){मलफुज़ते तैमूरी के हवाले से},गुरु अर्जन देव के हत्त्यारे को "अद्ले जहाँगीर"कहने वाला इतिहास,महा निर्लज्ज,महा धूर्त,पराई बहू बेटियों का अपहरण कर्ता जिसके राज्य में हज़ारों वीरांगनाओ द्वारा अपने सतीत्व की रक्षा हेतु"जौहर" करना पड़ा,को महान बताने वाला इतिहास,हमें क्या उत्तर देगा| 
क्या हमारी गुलामी का इतिहास उस दिन से शुरू होता है,जिस दिन अँग्रेज़ों ने बंगाल के नवाबों को पछाड़ दिया,जिस दिन अवध के वाजिद अली शाह गिरफ्तार कर लिए गये,जिस दिन सैकड़ों लाशों के बीच एक लाश टीपू सुल्तान की भी गिर गयी,जिस दिन बहादुर शाह को कोए यार में दो गज़ ज़मीन भी ना मिली|जिस दिन चोरों को मोर पड़ गये|हिंदू रजवाड़े तो अँग्रेज़ों से पहले भी मुगल सलतनत के गुलाम थे|अतः अँग्रेज़ों नेजब भारत को स्वतंत्र किया तो सत्ता बहादुर शाह के वंशजों को मिलनी चाहिए थी,क्योंकि हमारे इतिहास के अनुसार वही तो भारत के मालिक और स्वतंत्रता सेनानी थे,और अगर भारतवासी यह महसूस करें की वो अब भी गुलाम हैं,तो एक नई जंगे आज़ादी छेड़ सकते हैं| 
और सच मूच ऐसा ही करना होगा,लेकिन यह जंगे आज़ादी ना गाँधीवादी आंदोलन से ना ही नेताजी सुभाष की आई एन द्वारा छेड़ी जाएगी,इस गुलामी की आज़ादी के लिए हमें उस तवारीख से लड़ना होगा जो वक़्तन- फवक़्तां चापलूस दरबारियों ने,अनपढ़ शाहों ने,दिमागी गुलामों ने लिखी है|इतिहासकार एच एम इलियट कहते हैं,मुगल युग का इतिहास एक निर्लज्ज,जानबूझ कर दिया गया धोका है| 
सम्राट चंद्र गुप्त भारत के अंतिम चक्रवर्ती राजा थे,उसके बाद भारत छोटे छोटे राज्यों में बंट गया,फिर भी भारत धर्म और संस्कृति की डोर से एक राष्ट्र के रूप में बँधा रहा|भरा की बाहरी भूगोलिक सीमाएँ यथावत रहीं|ईस्वी सन ७१२ में मोहम्मद-बिन-क़ासम के आक्रमण से स्वतंत्रता प्राप्ति तक भारत १२०० वर्ष से भी अधिक गुलाम रहा|अँग्रेज़ों ने लगभग २०० वर्ष भारत पर शासन किया,यद्यपि अँग्रेज़ों के विरुध संघर्ष काल में अनेकों राजा रानियों,डूबती मुगल सलतनत के सुल्तानों ने वा अन्य मुस्लिम बादशाहों ने संघर्ष किया और मिरत्यु को प्राप्त हुए,फिर भी सामूहिक रूप से अँग्रेज़ों का मुक़ाबला करने में असमर्थ रहे,और अंततः उनके अधीन हो गये|यद्यपि सन १७५७ से ही अँग्रेज़ों के विरुद्ध रनभेरी गूंजने लगी थी,और १८५७ में तो पूर्ण रूप से स्वतंत्रता संग्राम की घोषणा ही कर दी गयी|परंतु एक संगठित और योजना बद्ध लड़ाई के अभाव में स्वतंत्रता प्राप्ति में ९० वर्ष लग गये| 
ब्रिटिश शासन ने अपने शासन लाल जो इतिहास हमें दिया है वो भी झूट का एक पुलिंदा है,फिर भी स्वतंत्रता संग्राम का सही इतिहास ,कवियों साहित्यकारों, स्वतंत्रतसेनानियों द्वारा लिखित पुस्तकों और बहुत समय ना बीते होने के कारण काफ़ी हद तक सही रूप में उपलब्ध है|यद्यपि स्वतंत्रता से पूर्व और स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी स्वतंत्रता संग्राम का जो इतिहास लिखा गया वो भी पक्षपात पूर्ण है,क्रांतिकारियों का योगदान अपूर्ण और उसकी महत्ता को कम करके दर्शाया गया है| 
मोहम्मद-बिन-क़ासिम के भारत पर आक्रमण से लेकर थोड़े थोड़े समय के लिए हुए,विभिन्न इस्लामी शासकों,और फिर बाबर से लेकर मुगल वंश के विनाश तक का जो इतिहास हमारे पास है,वो सचाई से बहुत परे और भ्रांथिपूर्ण है|आवश्यकता है एक गहन शोध की इस संबंध में|आज हमारे सामने जितनी समस्या पारयावरण प्रदूषण की है,उतनी ही गंभीर समस्या संस्कृति और इतिहास के प्रदूषण की है|यदि हमने अपने संविधान की मूल भावना क़ायम रखनी है,धर्मनिरपेक्ष स्वरूप,लोकतंत्र और अखंडता की रक्षा करनी है तो भ्रांतियों को दूर कर इतिहास की वास्तविकता से अपने को परिचित कराना होगा|इतिहास का पुनरावलोकन,पुनर्लेखन करना होगा|इतिहास जहाँ हमें अपने पूर्वजों द्वारा किए गये अच्छे कारियों के लिए गौरवान्वित करता है वहीं उनके द्वारा किए गये बुरे कारियों और भूलों के प्रति सचेत भी करता है,कहते हैं इतिहास अपने को दोहराता है,परंतु इतिहास अपने को तभी दोहराता है जब हम इतिहास के छुपे सत्य की अवहेलना करते हैं| 
सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर आज तक के युग को हम दो भागों में बाँटते हैं| 
-इतिहास काल -प्रागेतिहासिक(इतिहास से पूर्व)|एतिहासिक काल का विवरण सही या ग़लत हमें समय समय पर लिखी गयी पुस्तकों में मिल जाता है,जिस पर शोध करने पर काफ़ी सीमा तक सचाई भी सामने जाती है,परंतु प्रागेतिहासिक काल का वर्णन तो हमें,धर्म पुस्तकों,आदि काल से चली रही मान्यताओं ,परंपराओं,प्राचीन समय की वास्तु कला,पुरातत्व अवशेषों,लोक विश्वास और आस्थाओं से ही मिलता है|एतिहासिक काल की घटनाएँ विवाद,तर्कौुर शोध का विशय हो सकती हैं,परंतु इतिहास पूर्व की घटनाओं की सत्यता का मापदंड तो केवल आस्था और विश्वास ही हो सकता है| 
 

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