ज ७
निम्न उधारण विशय से परे नहीं होगा|
काकीनाडा (आंध्र प्रदेश)के कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जो एक मुस्लिम सज्जन थे,उस समय जब वन्दे मातरम गाया जा रहा था यह कहकर उठ कर चले गये की हम केवल खुदा को सिजदा करते हैं लिहाज़ा हम वन्दे मातरम नहीं गा सकते|कौन सा धर्म मा की वन्दना करने से रोकता है,भारत की यह धरती हमारी मा है,यदि भारत मा की वन्दना करना किसी धर्म में निषेद है तो उस धर्म के अनुयायी को भारत मा की गोद में पालने का कोई अधकर नहीं|इस्लाम का भी अक़ीदा है की बिना मा का दूध बख़्शवाए जन्नत हासिल नहीं होती,फिर मा की वन्दना से परहेज़ कैसा|हम अल्लाह के सिवा किसी और को सिजदा करने को नहीं कहते लेकिन मा का एहतराम तो करना ही होगा|
राष्ट्र ध्वज,राष्ट्र गान,राष्ट्र गीत ,भारतीय संस्कृति और भारत के संविधान का सम्मान तो हर वासी को करना ही होगा |क्या कभी हिंदू-पारसी झगड़ा भी सुना है,फिर हर जगह विवाद हिंदू मुस्लिम ही क्यो?शक और हूंन भी भारत आए थे,कुछ समय तक राज भी किया था परंतु वो भारत में इस तारह विलीन हो गये की उनका नाम भी अब इतिहास के पन्नों में ढूंडना पड़ता है|बात फिर वहीं आ जाती है,इतिहास की सचाई को समझना होगा,गुलामी की स्मृति के सारे चिन्ह मिटाने होंगे|
संत फ़क़िरों के मज़ारों का हदुओं ने सदा सम्मान किया है|अजमेर शरीफ में हिंदू उतनी ही श्रद्धा से जाता है जितनी की मुसलमान,अमीर ख़ुसरो से हम मुसलमानों से भी ज़्यादा मोहब्बत करते हैं,संत कबीर हमारे भी उतने ही है जीतने किसी और के|हिड. एहसान फारमोश भी नहीं है,बाबा अमर नाथ के चढ़ावे तीसरा हिस्सा हम उस परिवार को देते हैं जिसने उस पवित्र गुफा की सूचना दी थी|प्रंतु उन आक्रमणकारियों,अतियाचारियों,बा बरों,अकबरों औरंज़ेबों के मज़ारों को हम हज़रत निज़ामुद्दीन के मज़ार का दर्जा देने को किसी क़ीमत पर तय्यार नहीं हैं|उन मक़बरों को हम पुरातत्व वास्तु मान कर भले ही नष्ट ना करें|मैं पूछता हूँ,अगर जर्नल डायर की क़ब्र भी भारत में होती तो क्या उसे भी हुमायूँ के मक़बरे का दर्जा मिलता,जलियान वाले बाग की रूहे,राजपूतानियों के जोहर की अग्नि शीखाएँ जवाब मांगती हैं|
मैं अपने मुस्लिम दोस्तों का आह्वान करता हूँ की वो राष्ट्रीय धारा में प्रवाहित होकर गुलामी के चिन्हों को मिटाने में कंधे से कंधा और स्वर में स्वर मिला कर साथ साथ चलें|कलकत्ता अँग्रेज़ों की पहली राजधानी था,जगाह जगह अँग्रेज़ों के घोड़ों पर बैठे हुए आदम क़द बुत लगे थे्अर सड़क का नाम अँग्रेज़ों के नाम पर था|अब वहाँ से सारे बुत हटा दिए गये हैं,सड़कों के नाम भारतीय महापुरषों तथा अन्य भारतीय नामों पर रख दिए गये हैं|दिल्ली में केवल ३ नामों को छोड़ कर सारे अँग्रेज़ी नाम सड़कों से हटा दिए गये हैं,फिर,अकबर शाहजहाँ हुमायूँ,औरंज़ेब,शेर शाह,लोधी तुगलक़,बहादुर शाह और अनेकों हमलावरों के नाम कौन से गौरव के प्रतीक हैं|आख़िर किसने रखे यह नाम,जिन सड़कों के यह नाम हैं उनके ज़माने में तो यह थी भी नहीं|अँग्रेज़ तो यह नाम कभी भी नहीं रख सकते थे,उन्होने तो बहादुर शाह को गिरफ्तार करके और दिल्ली क़ब्ज़ा करके एक एक मुगल को बीन बीन कर मारा था|और यह सड़कें तो१९३७ के आस पास बनी थी|ज़रूर यह नाम नेहरू ने अपने मुस्लिम मुगल दादा ग्यासूद्दीन ग़ाज़ी की रूह को खुश करने के लिएरखे होंगे|क्या अब इन मार्गों के नाम उन वीरों के नाम पर नहीं रखे जेया सकते जो इन बर्बर लुटेरों से लड़ते लड़ते शहीद हो गये|क्या हमारी सरकार इन नामों को हटाने से इस लिए डरती है की मुसलमान नाराज़ हो जाएँगे अथवा धर्मनिरपेक्षता घायल हो जाएगी|यदि ऐसा ही है तो अँग्रेज़ी नाम(ईसाई नाम) हटाते समय ईसाई नाराज़ क्यों नहीं हुए|धर्मनिरपेक्षता घायल क्यों नहीं हुई|
यदि खुदी राम बोस की क़ुर्बानी हमें याद है,तो हम ज़ालिम औरंगज़ेब द्वारा गुरु गोविंद सिंह जी के साहब ज़ादौ की क़ुर्बानी कैसे भूल सकते हैं,सरदार भगत सिंह की क़ुर्बानी हमैन याद है तो "अद्ले जहाँगीर"कहे जाने वाले निर्दयी द्वारा गुरु अर्जन देव जी की क़ुर्बानी हम कैसे भूल सकते हैं|वीर बालक हक़ीक़त राय का रक्त आज भी हमारी आँखों के सामने बह रहा है,गुरु द्वारा सीस गंज के सामने से जब गुज़रते हैं,गुरु तेग बहादुर जी काबलिदान याद करके खून खौलने लगता है|लोकप्रिय दिवंगत प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी का शहीदी स्थल उसी पापी औरंगज़े ब के नाम की सड़क पर है|मैं भारतीय मुसलमानों से पूछता हूँ,उन्हें विदेशी आक्रमणकारियों पर गर्व है या भारत के शहीदों पा|यह बहुत अहम सवाल है|
इंडिया गेट के सामने बनी छतरी पर जार्ज पंजाम की प्रतिमा लगी थी जो स्वतंत्रता प्राप्ति के १५ वर्ष हटाई गयी,उसके स्थान पर महात्मा गाँधी की प्रतिमा लगाने पर दस वर्ष विचार विमर्श होता रहा,पर आज भी वो स्थान रिक्त है,अब महात्मा गाँधी प्रतिमा किसी और स्थान पर लगाने की बात हो रही है|उस छतरी को गुलामी का चिन्ह माना जा रहा है|यह क्यों नहीं सोचा जाता की महात्मा राष्ट्रीय गाँधी की प्रतिमा उस स्थान पर लग जाने के उपरांत वो गुलामी का नहीं हमारी विजय का प्रतीक बन जाएगा|उस छतरी को तो गुलामी का चिन्ह माना जा रहा है और उन क्रूर मुस्लिम आक्रमणकारियों के मक़बरों कोराष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया है|
गुलामी का चिन्ह है वो ६ घोड़ों की बग्घी,जिस पर बैठ कर हमारे राष्ट्रपति बड़ी शान से निकलते हैं|अँग्रेज़ी शनोशौकत से सजे धजे वो अंगरक्षक,सैकड़ों कक्षों वाला वो वायसरीगल हाउस(राष्ट्रपति भवन)|गुलामी का चिन्ह है वो मुगल गार्डन जिसका मुगलों से कोई संबंध नहीं|राष्ट्रपति राष्ट्र का अध्यक्ष होता है राष्ट्र का स्वामी नहीं|हमारा राष्ट्रपति संविधान का रखवाला है ,ब्रिटन की महारानी की तारह कोई परंपरागत पद नहीं|
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