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इक संबल राष्ट्र चेतना का
चढ़ गये शिखर पेर राम भक्त ,क्या होगा रामलला जाने,बह चला रक्त रंजीत होकर सरयू का नीर कहाँ जाने.
जन जन से पूजिट राम शेला हैं धर्म क्रांति का आह्वाहंन,अब निकल पड़े हैं हिंदू जान खोया गौरव फिर से पाने.
था सुप्त अवस्था में हिंदू मान में विषाद था अंधकार,हर नगर ग्राम में राम ज्योति आई ज्योतिसना फैलाने.
बनवास काल में भ्राता ने जो चरण पाड़ुकाएँ पूजीं,लाएँगी फिर से राम र
इक संबल राष्ट्र चेतना का
चढ़ गये शिखर पेर राम भक्त ,क्या होगा रामलला जाने,बह चला रक्त रंजीत होकर सरयू का नीर कहाँ जाने.
जन जन से पूजिट राम शेला हैं धर्म क्रांति का आह्वाहंन,अब निकल पड़े हैं हिंदू जान खोया गौरव फिर से पाने.
था सुप्त अवस्था में हिंदू मान में विषाद था अंधकार,हर नगर ग्राम में राम ज्योति आई ज्योतिसना फैलाने.
बनवास काल में भ्राता ने जो चरण पाड़ुकाएँ पूजीं,लाएँगी फिर से राम र
ाज्य कोई माने या ना माने.
उत्ताल तरेंगें सागर की, उत्तुंग शिखर हिं आँचल के,दे रहे चेतना उठ हिंदू चल लोहा अपना मनवाने.
हैं शक्ति आसुरी प्रबल हुईं,घर घर फिरते हैं रक्त बीज,मा काली आओ एक बार फिर रक्त आसुरी पी जाने.
यह जन्म भूमि मंदिर होगा इक संबल राष्ट्र चेतना का,ओ भ्रमित हिंदुओं भ्रम तौडो रंग लो फिर केसरिया बाने.
हर प्रयास किया समझौते का विनिटी प्रमाण सब व्यर्थ गये,चल पड़े कार सेवक फिर से अब विजय पताका फेह्राने.
रुनभेरी गूँज उठी चहुँडिश,अंतिम निर्णया की वेला है,कर चुका बहुत तू शांति पाठ उठ क्रांति ज्वाल को धधकाने.
है लगा दाओं पर हिनडुपन मंदिर है स्रोत प्रेरणा का,कह रहे गर्व से हिंदू हैं जो लगे थे कल तक शरमाने.
या आज अभी या कभी नहीं नेपथ्या दे रहा सदा तुझे,जब चग जाएँगी खेत छिड़ी मत पेचहताना ओ दीवाने.
नर-सिंघ अवतार हुआ था इक, भक्तों की रक्षा हेतु कभी,अब जन्मे हैं नरसिम्हा रौउ,भक्तों पर गोली चलवाने.
था जहाँ राम ने जन्म लिया मंदिर निर्माण वहीं होगा,वो चूर चूर हो जाएगा संतों से आया टकराने.
---------विनोद कुमार मित्तल --------
उत्ताल तरेंगें सागर की, उत्तुंग शिखर हिं आँचल के,दे रहे चेतना उठ हिंदू चल लोहा अपना मनवाने.
हैं शक्ति आसुरी प्रबल हुईं,घर घर फिरते हैं रक्त बीज,मा काली आओ एक बार फिर रक्त आसुरी पी जाने.
यह जन्म भूमि मंदिर होगा इक संबल राष्ट्र चेतना का,ओ भ्रमित हिंदुओं भ्रम तौडो रंग लो फिर केसरिया बाने.
हर प्रयास किया समझौते का विनिटी प्रमाण सब व्यर्थ गये,चल पड़े कार सेवक फिर से अब विजय पताका फेह्राने.
रुनभेरी गूँज उठी चहुँडिश,अंतिम निर्णया की वेला है,कर चुका बहुत तू शांति पाठ उठ क्रांति ज्वाल को धधकाने.
है लगा दाओं पर हिनडुपन मंदिर है स्रोत प्रेरणा का,कह रहे गर्व से हिंदू हैं जो लगे थे कल तक शरमाने.
या आज अभी या कभी नहीं नेपथ्या दे रहा सदा तुझे,जब चग जाएँगी खेत छिड़ी मत पेचहताना ओ दीवाने.
नर-सिंघ अवतार हुआ था इक, भक्तों की रक्षा हेतु कभी,अब जन्मे हैं नरसिम्हा रौउ,भक्तों पर गोली चलवाने.
था जहाँ राम ने जन्म लिया मंदिर निर्माण वहीं होगा,वो चूर चूर हो जाएगा संतों से आया टकराने.
---------विनोद कुमार मित्तल --------
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